मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

तीर ए तरकश

तीर ए तरकश चोली दामन भूल गए |
सांसों को दिल तक लाना भूल गए ||

माना कोई गुनाह नहीं किया तुमने |
क्यों नजरो से नज़र मिलाना भूल गए ||

रंजो गम की श्याही से लिखते लिखते |
चैनो अमन का पेन चलाना भूल गए ||

रिश्तों की फैली चादर एसी सिमटी |
आना जाना हाथ मिलाना भूल गए ||

जहाँ कभी भुट्टे की चौपालें थी |
गांव का अपने नीम पुराना भूल गए ||

लाख किताबें पढली होंगी तुमने लेकिन |
बचपन का वो क ख ग घ भूल गए ||

ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए ||

20 टिप्‍पणियां:

satya ने कहा…

उम्दा लिखा

लिखो, और लिखो, लिख लिख कर लिखो
लिखोगे तो कलम में धार आएगी
यह बात ही जीवन में बहार लाएगी
कहे सागर यह nadi दूर तक जाएगी
साल २०१० में आप के आँगन में बरात आएगी
सत्या

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए ||

गज़ब .....!!

हर शे'र लाजवाब लगा .....बहुत खूब .....!!

nikhil ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है
हर एक शेर में वजन है
लाख किताबें पढली होंगी तुमने लेकिन |
बचपन का वो क ख ग घ भूल गए ||
इस शेर में तो अपने बचपन की याद दिलादी
सच भी है बचपन के तो सरे सबब भूल गए है
बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल है
हर एक शेर में वजन है
लाख किताबें पढली होंगी तुमने लेकिन |
बचपन का वो क ख ग घ भूल गए ||
इस शेर में तो अपने बचपन की याद दिलादी
सच भी है बचपन के तो सरे सबब भूल गए है
बहुत बहुत आभार

रंजीत ने कहा…

jee, main to aise khyalatee dunia ka muntazir hun.
congggg

अजय कुमार ने कहा…

तरकश के सारे तीर निशाने पर लगे ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

रिश्तों की फैली चादर एसी सिमटी |
आना जाना हाथ मिलाना भूल गए ||

बहुत सुन्दर!

Apanatva ने कहा…

रिश्तों की फैली चादर एसी सिमटी |
आना जाना हाथ मिलाना भूल गए ||

ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए ||
bahut sunder abhivykti,sunder vicharo kee. Aabhar !!

shama ने कहा…

Harek sher sundar!

Devendra ने कहा…

ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए।।
--अच्छे भाव।
मुझे तो गज़ल लिखना बहुत कठिन विधा लगती है।
आप भी किसी गज़ल गुरू से पूछ लो मीटर का क्या चक्कर है!

sandhyagupta ने कहा…

ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए |

Bahut khub.Badhai.

sakshi ने कहा…

बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल सरे शेर एसे है जैसे मोतियों की माला
समझना कठिन हो गया है किसको ज्यदा अच्छा कहूँ |
धन्यवाद ....................

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

इस गज़ल के साथ साथ पिछली गज़ल भी पढ़ी....सभी गज़ले लाजवाब..कहन गढ़न सब म्दा हैं आपके...!

भविष्य के लिये शुभकामनाएं..

shriraj ने कहा…

रिश्तों की फैली चादर एसी सिमटी |
आना जाना हाथ मिलाना भूल गए ||
gazab ..............
bahut bahut abhar ..........

mayur ने कहा…

मज़ा आगया सिंह साहब
मस्त ग़ज़ल का बेहतरीन शेर
जहाँ कभी भुट्टे की चौपालें थी |
गांव का अपने नीम पुराना भूल गए ||
आपको बहुत -२ बधाई

mayur ने कहा…

मज़ा आगया सिंह साहब
मस्त ग़ज़ल का बेहतरीन शेर
जहाँ कभी भुट्टे की चौपालें थी |
गांव का अपने नीम पुराना भूल गए ||
आपको बहुत -२ बधाई

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए ||
... कुछ खास बात है, प्रसंशनीय गजल !!!!

योगेश स्वप्न ने कहा…

रिश्तों की फैली चादर एसी सिमटी |
आना जाना हाथ मिलाना भूल गए ||


bahut hi umda. badhaai.

सत्यम न्यूज़ ने कहा…

बहुत खूब हर बार नया लेकर आ रहे हो.मज़ा आ गया.

शोभना चौरे ने कहा…

man ko chute huye sher .

singhsdm ने कहा…

भाई क्या खूब लिखा है ...............पुष्पेन्द्र...!
अभी ग़ज़ल का ग्रामर थोडा कमजोर है .......कुछेक कमियां है.......मगर ख्याल बहुत अच्छे हैं. इसी तरह लिखते रहो......बहुत ही अच्छा प्रयास.........!
ज्ञान बाँटना फितरत इस दुनियां की |
अपने आपको हम समझाना भूल गए।।
excellent..........simply superb!

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