शनिवार, 6 अगस्त 2011

दरवाजे दिल के.....

आइने खुद को दगा देते है |
हकीकत चहरो की बता देते है ||

जरा सा प्यार से पूछा किसी ने |
रास्ता अपने घर का बता देते है ||

जुल्म जब हद से गुजर जाता है |
अपने भी हाथ उठा देते है ||

शर्द मौसम में शाम ढलते ही |
दरवाजे दिल के लगा देते है ||

घर से निकले थे इबादत के लिए |
किसी रोते को हंसा देते है ||

चलो कुछ हट के कोई बात करें |
आग दुनियां को लगा देते है ||

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बुद्ध हँसते है मुस्कराते है.......

बुद्ध हँसते है मुस्कराते है |
पैदा होने की सजा पाते है ||

जिन्दा रहते तो समझे नहीं |
घर में तस्वीर अब सजाते है ||

देश को जकड़ा है भ्रष्टाचार ने |
गीत दौलत के गुनगुनते है ||

बड़ी मजबूर धरती माँ हमारी |
संसद में बोलियाँ लगाते है ||

भूख से दम तोड़ता इन्सान है |
अनाज गोदाम में सड़ाते है ||

यही इस देश का दुर्भग्य है |
झुके कंधे देश चलाते है ||

शुक्रवार, 24 जून 2011

बीती बातें...................!

बीती बातें दिल से लगाना ठीक नहीं |

बात बात पर बात बनाना ठीक नहीं |


प्यार मुहब्बत बातें अच्छी लगती है |

आँखों से दिल का रास्ता ठीक नहीं ||


ये धरती शरशब्ज लगे तो अच्छा है |

खेतों में तलवारें बोना ठीक नहीं ||


सरहद को देखा तो फिर अहसास हुआ |

आंगन में दीवारें होना ठीक नहीं ||



खुद में इन्सां देखो कितना बदल गया |

कहते है सब लोग जमाना ठीक नहीं ||

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

कहीं चन्दा कहीं.....

कहीं चन्दा कहीं तारे कही जुगनू चमकते है |
हजारों खुशबुएँ नाकाम है जब वो महकते है ||

कौन कहता इश्क में मंजिल नहीं मिलती |
मुहब्बत की कशिश से दोस्तों पत्थर पिघलते है ||

खुदाया बख्श दे ऐसी नियामत आज उनको |
हजारों फूल हों पैदा जहाँ पत्थर निकलते है ||

गैरों की छोड़ो बात हम अपनों की करते है
गर्दिश में जो हों तारे यहाँ चहरे बदलते है ||

ये कौन सी दुनिया में आ गये है हम |
अमन के फूल खिलते थे वहां शोले दहकते है ||

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

दिल का बोझ हटाना होगा ..........

दिल का बोझ हटाना होगा |

सब को गले लगाना होगा ||


तोड़ के रिश्ते देख लिया जो |

कीमत वही चुकाना होगा ||


किसने दी है दिल को दस्तक |

कोई जख्म पुराना होगा ||


आओ तोड़ें चाँद सितारे |

बच्चों को बहलाना होगा ||


हर कंधे पर उम्मीदें है |

करके कुछ दिखलाना होगा ||


बातें करना प्यार वफ़ा की |

गुजरा हुआ जमाना होगा ||

सोमवार, 27 सितंबर 2010

हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए.......

अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||

ये किस राह का में रह गुजर हूँ |
कोई पत्थर नहीं उठाने के लिए ||

भले ही लाखों जख्म खाए लेकिन |
दिल है तैयार लगाने के लिए ||

सभी है अपने में मशरूफ साकी |
तुम भी रूठे हो मानाने के लिए ||

यहाँ तो है सभी कातिल निगाहें |
नजर के तीर चलाने के लिए ||

रविवार, 1 अगस्त 2010

सिलसिला

सिलसिला इश्क यूँ ही चलने दो |
लोग जलते है जलें जलने दो ||

लूट कर ले गए वो ख्वाब सभी |
बातों बातों में रात ढलने दो ||

फिर संभल जाएगी हर बहर अपनी |
उनके होठों की गजल बनने दो ||

दिल का मिलना तो दूजी बात है |
पहले हाथों से हाथ मिलने दो ||

(और यह शेर मैने अपने बड़े भइया परम आदर्णीय "पवन जी" के लिए लिखा है )

बस यही इल्तजा रही उनसे |
अपने पैरों की धूल बनने दो ||

खोजें