सोमवार, 27 सितंबर 2010

हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए.......

अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||

ये किस राह का में रह गुजर हूँ |
कोई पत्थर नहीं उठाने के लिए ||

भले ही लाखों जख्म खाए लेकिन |
दिल है तैयार लगाने के लिए ||

सभी है अपने में मशरूफ साकी |
तुम भी रूठे हो मानाने के लिए ||

यहाँ तो है सभी कातिल निगाहें |
नजर के तीर चलाने के लिए ||

17 टिप्‍पणियां:

Shekhar Suman ने कहा…

waah...
bahut khub..
maza aa gaya....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर गज़ल. बधाई.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत सुन्दर!

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

Wah wah….khoobsoorat prastuti…!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||

बेहतरीन गज़ाल का लाजवाब शेर .... बहुत कमाल की बात लिखी है ...

singhsdm ने कहा…

वाह वाह चुप्पी टूटी......स्वागत है पिंटू ग़ज़लों के इस अखाड़े में....!
अच्छी ग़ज़ल लिखी है.....
मतला सुन्दर है....... ज़ख्म छुपाने के लिए शहर को छोड़ देने का भाव..... नया भी उम्दा भी
अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||
शायद टाइपिंग मिस्टेक है...जुजर की जगह गुज़र हून चाहिए...बाकि सब दुरुस्त.....!
ये किस राह का में रह जुजर हूँ |
कोई पत्थर नहीं उठाने के लिए ||
भले ही लाखों जख्म खाए लेकिन |
दिल है तैयार लगाने के लिए ||
(सबसे अच्छा शेर..... दाद देनी पड़ेगी )
इस शेर के तो क्या कहने.......!
यहाँ तो है सभी कातिल निगाहें |
नजर के तीर चलाने के लिए ||
बहुत बहुत प्यार.......! अब थोडा रेगुलर रहने की कोशिश करो......!

Babli ने कहा…

वाह! बहुत बढ़िया और शानदार ग़ज़ल लिखा है आपने! उम्दा प्रस्तुती!

sheetal ने कहा…

Bahut sundar ghazal.

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

behad sunder gazal..... achhi rachna ke liye badhai

ShyamKant ने कहा…

वाह भैय्या मज़ा आ गत्या.............
इतनी सुंदर रचना की दिल करता है की पड़े जाओ बस ......................
वैसे इस रचना मै मुझे ये लाइन बहुत पसंद आई.......
अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||
सोचने की शानदार झमता है आप में फिर इसे प्रस्तुत भी खूब कर देते हो आप ............
मै कोशिस कर रहा हूँ जब भी मौका मिले एक-दो गजल आपकी पढ़ लूं ............
आपका छोटा भाई श्याम कान्त ..............................

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

भाई पी सिंह जी

अच्छी ग़ज़ल लिखी है
ये किस राह का में रह गुजर हूं
कोई पत्थर नहीं उठाने के लिए


शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

नीरज गोस्वामी ने कहा…

ये किस राह का में रह गुजर हूँ |
कोई पत्थर नहीं उठाने के लिए

Behtariin rachna...

Neeraj

P S Bhakuni (Paanu) ने कहा…

....अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||
सुन्दर प्रस्तुति...
आपको और आपके परिवार को नवरात्र की हार्दिक शुभ कामनाएं ,

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

भले ही लाखों जख्म खाए लेकिन |
दिल है तैयार लगाने के लिए ||

वाह ..वाह....बहुत खूब ......

चोट खायी है बहुत दिल ने फिर भी
दिल लगाने की कसम खाई है हमने

Umra Quaidi ने कहा…

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए
बेहतरीन गज़ाल का लाजवाब शेर
बधाई.

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