शुक्रवार, 19 मार्च 2010

धूल समझ के

धूल समझ के किसने उड़ा दिया मुझको |
में तो ठहरा था किसने जगा दिया मुझको||

बात इतनी सी मै जुबाँ से कैसे कहूँ |
तेरे ही जैसा था जिसने दगा दिया मुझको ||

मैंने पी थी बहुत मगर कभी नशे में न था |
तू ने आँखों से क्या पिला दिया मुझको ||

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||

तेरा अहसान में समझूँ तो किस तरह समझूँ |
अपने ही रंग में हर रंग दिखा दिया मुझको ||

20 टिप्‍पणियां:

mayur ने कहा…

मस्त गजल लाजबाब शेर उस्ताद
तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||
क्या बात है
बधाइयाँ

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||
क्या बात है!! बहुत उम्दा शेर. बधाई.

योगेश स्वप्न ने कहा…

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||

bahut khoob.

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुन्दर गज़ल।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

oye hoye....oye hoye...oye hoye...

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||

bhaiye kahan kahaan se teer nikaal ke laa rahi ho??

ghaayal kar diya singh bhai....

chuk diye fatte....

tulnaa karna bekaar hai....

amazing...aafareen!!

shama ने कहा…

मैंने पी थी बहुत मगर कभी नशे में न था |
तू ने आँखों से क्या पिला दिया मुझको ||
Kya khoob gazal kahi hai!

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! इस उम्दा रचना के लिए बधाई!

Prem Farrukhabadi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Prem Farrukhabadi ने कहा…

P singh ji,
bahut hi behtar rachna dee hai is baar aapne. Har sher mein gahrai dikhi. adubhut .sarhneey.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

बात इतनी सी मै जुबाँ से कैसे कहूँ |
तेरे ही जैसा था जिसने दगा दिया मुझको ||

बहुत खूब .....!!

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||

वल्लाह......!!

shriraj ने कहा…

धूल समझ के किसने उड़ा दिया मुझको |
में तो ठहरा था किसने जगा दिया मुझको||

bahut khoob, kya khoob likha

बात इतनी सी मै जुबाँ से कैसे कहूँ |
तेरे ही जैसा था जिसने दगा दिया मुझको ||

bas apna beeta zamana yaad aa gaya
aabhaar sweekar karen

singhsdm ने कहा…

बात इतनी सी मै जुबाँ से कैसे कहूँ |
तेरे ही जैसा था जिसने दगा दिया मुझको ||
वाह भाई पुष्पेन्द्र क्या लिख दिया है ........बहुत अच्छा!

mayur ने कहा…

singh sahab
umda prastuti
तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||
lajbab...............................................

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar ने कहा…

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||

तेरा अहसान में समझूँ तो किस तरह समझूँ |
अपने ही रंग में हर रंग दिखा दिया मुझको ||
खूबसूरत और प्रभावशाली-----

kshama ने कहा…

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा |
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ||
Bahut khoob!
Ramnavmi ki anek shubhkamnayen!

CS Devendra K Sharma ने कहा…

मैंने पी थी बहुत मगर कभी नशे में न था |
तू ने आँखों से क्या पिला दिया मुझको |

kya khub likha hai sir. vo kehte hai na..
"taalab dariya ya samandar..chaahkar bhi dubega kaun..........jheel si ankhe ho to fir doobna manzoor hai!!!!"

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तेरे वस्ल की कीमत में उस समय समझा
जब हाथ हिला के विदा किया मुझको ..

वाह जनाब ... क्या ग़ज़ब का शेर कह दिया है .. कुर्बान हूँ इस शेर पर ... पूरी ग़ज़ल नायाब है ..

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Har ek sher umda hai tera ae rafeeq!
Ek ki taareef doosre ki tauheen hogi!!!

usha rai ने कहा…

धूल समझ के किसने उड़ा दिया मुझको |
में तो ठहरा था किसने जगा दिया मुझको||
बहुत सधी हुई कलम है आपकी ! भाषा
की सादगी ने दिल छू लिया !

Ravi Rajbhar ने कहा…

wah sir,
kya khoob kaha apne..bahut hi pyari rachna.

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