बुधवार, 27 जनवरी 2010

कली बागों में खिल नहीं पाती

कली बागों में खिल नहीं पाती |
गीत भंवरों का सुन नहीं पाती ||

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||

यही सजा है गाँव से बिछड़ने की |
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती ||

यही वजह है आपसी तकरार की |
बात बातों में मिल नहीं पाती ||

झूठ से दिल बहल जाता है लेकिन |
चालाकी देर तक चल नहीं पाती ||

19 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||
वाह बहुत सुन्दर शेर.कितना बडा सच कह दिया आपने. और-
यही सजा है गाँव से बिछड़ने की |
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती ||
बहुत सुन्दर. उनके लिये खासतौर से जो अपने बडों से दूर हैं, लेकिन बहुत सच्ची बात. बधाई.

मनोज कुमार ने कहा…

ग़ज़ल क़ाबिले-तारीफ़ है।

योगेश स्वप्न ने कहा…

यही सजा है गाँव से बिछड़ने की |
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती ||

bahut zaroori hai ye naseehat jisse aaj yuva varg door hai.

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने!

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

यही सजा है गाँव से बिछड़ने की |
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती ||


गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

बहुत ख़ूबसूरत

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

... बहुत खूब ...प्रसंशनीय गजल !!!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

waakai chaalaaki der tak chal nahi paati...

sahi kaha aapne...

shama ने कहा…

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||

यही सजा है गाँव से बिछड़ने की |
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती ||
Bahut khoob!

अजय कुमार ने कहा…

शानदार रचना , अच्छी लगी

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सटीक और मार्मिक चित्रण किया है

nikhil ने कहा…

वह क्या बात है
सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||
लोग सच बोलना तो चाहते है
लेकिन जुबान झूठ की आदी है
बधाई

संजय भास्कर ने कहा…

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

अबयज़ ख़ान ने कहा…

दोस्त... ये सच है कि चालाकी कभी भी देर तक चल नहीं पाती..

mayur ने कहा…

गजब का शेर बहुत गहरे लिए हुए
यही वजह है आपसी तकरार की |
बात बातों में मिल नहीं पाती ||
अगर सभी को एक दुसरे की बात का सही
अर्थ समझ में आजाये तो कोई समस्या न हो

अर्कजेश ने कहा…

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||

हर बार सहजता के बढिया गजल कह रहे हैं आप ।

singhsdm ने कहा…

पीसिंह जी
सारे शेर अच्छे बन पड़े हैं.......

कली बागों में खिल नहीं पाती |
गीत भंवरों का सुन नहीं पाती ||
बढ़िया मतला है.......

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||
बहुत अच्छे बेटा.......

यही सजा है गाँव से बिछड़ने की |
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती ||
व्याकरण के हिसाब से गलत है मगर भाव बहुत अच्छा है........

यही वजह है आपसी तकरार की |
बात बातों में मिल नहीं पाती ||
वाह वाह घर घर की कहानी लिख दी .........!

बहुत ही बढ़िया रचना...दिल को छू जाने वाली,
**********************************

दिगम्बर नासवा ने कहा…

यही सजा है गाँव से बिछड़ने की
नसीहत बुजुर्गों की मिल नहीं पाती .....

कमाल का शेर हैं ....... बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है ....... हक़ीकत से जुड़ा .........

sakshi ने कहा…

सिंह साहब
इस शेर की जितनी तारीफ की जाये कम है

लाजबाब शेर

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||
धन्यवाद

sandhyagupta ने कहा…

सच अभी तक दिलों में जिंदा है |
जुबाँ कहने को खुल नहीं पाती ||

Bahut khub.Kab khulegi juban?

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