मंगलवार, 12 जनवरी 2010

अपनों से ही हमें शिकायत..

अपनों से ही हमें शिकायत होती है |
गैरों से तो सिर्फ सियासत होती है ||

जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||

शाख-शाख पे अम्न-ओ-चैन के फूल खिलें |
आँखों की बस यही इनायत होती है ||

कब आते हो कब जाते हो पता नहीं |
इस दिल पे हर रोज़ क़यामत होती है ||

इश्क तो लैला मजनू,सींरी करते थे |
अब तो इश्क में सिर्फ तिजारत होती है ||

31 टिप्‍पणियां:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

milne mein bhi aaj kifaayat hoti hai...

singh saab boht achhi baat kahi aapne apni is prastuti mein....

nikhil ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आप ने -
जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||
क्या लिखा है सर
पूरी की पूरी ग़ज़ल कयामत है
आभार ..................

singhsdm ने कहा…

जीयो ..........क्या खूब लिखा है तुमने
अपनों से ही हमें शिकायत होती है |
गैरों से तो सिर्फ सियासत होती है ||
क्या खूबसूरत मतला है.......
महज पांच शेरों में एक जीवन जी दिया.....सच मानो बहुत ही अच्छी रचना.

सत्यम न्यूज़ ने कहा…

दिल को छूने वाली गज़ल लिखी है

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

सही कहा आपने, आपको ही नहीं सभी को अपनों से ही शिकायत होती है।
--------
अपना ब्लॉग सबसे बढ़िया, बाकी चूल्हे-भाड़ में।
ब्लॉगिंग की ताकत को Science Reporter ने भी स्वीकारा।

मनोज कुमार ने कहा…

आपसे सहमत हूं। अच्छी रचना।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

इश्क तो लैला मजनू,सींरी करते थे
अब तो इश्क में सिर्फ तिजारत होती है ....

बहुत ही खूब कहा है ....... सच में अब मुहब्बत भी नही बची ........ राजनीति हर किसी को जकड़ती जा रही है ......

मोहसिन ने कहा…

Rachna bahut hi acchi lagi. Shubhkamnay.

योगेश स्वप्न ने कहा…

behatareen.

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

शाख-शाख पे अम्न-ओ-चैन के फूल खिलें |
आँखों की बस यही इनायत होती है ||
... बेहद प्रभावशाली शेर, पूरी गजल प्रसंशनीय !!!!!

आशु ने कहा…

"अपनों से ही हमें शिकायत होती है |
गैरों से तो सिर्फ सियासत होती है ||

जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||"

वाह...क्या पते की बात कह दी आप ने इन चाँद लाइनों में ...
मुबारिक इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए

आशु

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

बंधुवर यह तो बहुत जमी ---
'' जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||
हम आपमें भी किफ़ायत गिरी देख रहें हैं ..
एक अच्छे ब्लोगर की पहचान उसके द्वारा
दी गयीं टिप्पणियाँ भी होती हैं , कल आपकी कई जगह यही
टीप देखी ---
'' इस अच्छी रचना के लिए
आभार ................. ''
कट-कोपी-पेस्ट का सस्ता तरीका , सोचना ज्यादा महत्वपूर्ण
है की रस्मअदायगी ... अब सोचिये हमारी पोस्ट पर भी आप यही
करके चले आये ... जहाँ 'रचना' जैसी कोई बात ही नहीं है ...
रस्मअदायगी से बेहतर मैं समझता हूँ कि टिप्पणी ही न आये ...
मेरी बात को अन्यथा न लीजियेगा .. संभव है आप मेरी यह टिप्पणी हटा भी
दें , हमें उसका अफ़सोस नहीं होगा , पर मैं चाहता हूँ कि कामचलाऊपन से
लोग बाज आयें ..
गजल अच्छी लगी , आभार ,,,

sakshi ने कहा…

सिंह जी,
यूँ तो आप की पूरी ग़ज़ल अच्छी है
पर इस शेर में कुछ बात है !!!!!!!!!!!
कब आते हो कब जाते हो पता नहीं |
इस दिल पे हर रोज़ क़यामत होती है ||
शुक्रिया

mayur ने कहा…

pushpendra bhai
maja agya aap ki gazl padh kar
apko bahut bahut badhai

Chandrika Shubham ने कहा…

I liked the first paragraph. :)
Nice!

सर्वत एम० ने कहा…

वाह वाह!! कमाल कर दिया आपने. ऐसी गजल कि तबीयत खुश हो गयी. आपने इन दिनों वाकई मेहनत की है और आपकी मेहनत साफ़ झलक रही है. इतने उम्दा और शानदार कंटेंट्स का इस्तेमाल किया है आपने कि तारीफ के शब्द भूल गया मैं. मेरी तरफ से मुबारकबाद. अब आगे से यह चमक, शान और हौसला बरकरार रहना चाहिए.

BrijmohanShrivastava ने कहा…

क्या पता भाई लैला मजनू और सींरी भी करते थे या नही ।जब अपने मौजूद है तो गैरों से शिकायत करने क्यों जायेंगे ।इन्सान बदल नही गया है व्यस्त हो गया है ।अच्छे शेर ।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

इश्क तो लैला मजनू,सींरी करते थे |
अब तो इश्क में सिर्फ तिजारत होती है ||

वाह .....सौ प्रतिशत सच .......!!

Apanatva ने कहा…

gazal acchee lagee . happy makar sankranti

हर्षिता ने कहा…

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए धन्यवाद।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||
बहुत सुन्दर शेर, बहुत सुन्दर गज़ल.

अल्पना वर्मा ने कहा…

bahut hi sundar gazal!
abhaar.

निपुण पाण्डेय ने कहा…

कब आते हो कब जाते हो पता नहीं |
इस दिल पे हर रोज़ क़यामत होती है ||


bahut sundar ghazal.....aise hi likhte rahen!!
:):)

ज्योति सिंह ने कहा…

जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||
bahut sundar sher aur gazal

गौतम राजरिशी ने कहा…

भाव अच्छे हैं...लेकिन लेबल में ग़ज़ल लगाने के लिये ये रचना यकीनन तनिक और मेहनत मांगती है।

शेष अमरेन्द्र जी की बातों से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ।

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

singh sahab ,bahut achchhi rachna ,badhai ke patra hain ap.

'अदा' ने कहा…

जाने इंसा कैसे इतना बदल गया |
मिलने में भी आज किफ़ायत होती है ||
बहुत सुन्दर शेर...

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

दिल खुश हो गया..आप तो बेहद उम्दा लिखते हैं..नज़र ही नहीं पडी थी.....!

Prem Farrukhabadi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Prem Farrukhabadi ने कहा…

कब आते हो कब जाते हो पता नहीं |
इस दिल पे हर रोज़ क़यामत होती है |

bahut hi sundar.Badhai!!

roz naye dhang se vo tarsaate hain
dekho to chehre pe sharafat hoti hai.

Devendra ने कहा…

गजल पर टिप्पणी करते हुए भी मुझे डर लगता है क्योंकि यह विधा मुझे बहुत कठिन लगाती है. फाइलातुन.. फाइलातुन समझा तभी एक अफलातून आया कहने लगा---धत्त ये तो मफाइलातुन है.
..भाव बेहद अच्छे हैं.

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