बुधवार, 11 नवंबर 2009

वक्त और इन्सान

वक्त और इन्सान का रिश्ता है सदियों से
दोनों एक ही थाली के चट्टे बट्टे है
और दोनों ही एक दुसरे के गुनाहगार है
इन दोनों के बिच छतीस का भी आंकडा है
कभी इन्सान वक्त को दोषी कहता है तो कभी वक्त इन्सान को
ये मसला एक पहेली की तरह उलझकर रह गया है
आखिर इन्सान दोषी है या वक्त
चूँ कि की फैसला भी एक इन्सान को ही करना है
तो वक्त तो जीतने से रहा
पर मुझे लगता है कि वक्त के साथ अन्याय हो रहा है
करे कोई भरे कोंई
जब भी कुछ गलत होता है तो
इन्सान कहता है कि वक्त ही ख़राब था
या सब वक्त की बात है
किसी से न मिल सका तो एक ही बात - वक्त ही नहीं मिलता
इन्सान तो वक्त के हाथ की कठपुतली है बगैरा -२
जब भी कुछ अच्छा होता है
तो सारा श्रेय खुद ही ले लेता है
कि मैंने एसा कर लिया
अब तो आप समझ ही गए होंगे कि माजरा क्या है
दरसल इन्सान अपने बचाव के लिए बहाने ढूड लेता है
कुछ हूँ तो मै कुछ न कर पाया तो वक्त का दोष है
इन्सान वक्त का ढाल कि तरह इस्तमाल कर रहा है
इस इंसान को समझना इन्सान के बस कि बात नहीं
क्योंकि इसको बना के ईश्वर भी सोचता है आखिर क्या है ये इन्सान -पर
कोई इस वक्त की व्यथा तो सुनो
वक्त का सही वक्त पर इस्तमाल करो

5 टिप्‍पणियां:

mayur ने कहा…

मजा आ गया दोस्त
तुमने तो इन्सान की पोल ही खोलदी वाह भाई वाह

nikhil ने कहा…

dil khush kar diya kya likha hai yar
mind blowing........

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सब वक़्त वक़्त की बात है !

shriraj ने कहा…

bahut acche, good yaar
time aur inshan ke liye kya likha hai
aur likho..

सत्यम न्यूज़ ने कहा…

इस पोस्ट को देखने के बाद क्या कहूँ....वक़्त ने इंसान को बदला या फिर इंसान ने वक़्त को .....खूब लिखा.तुम अपने हों इसलिए इन्तहां ख़ुशी हुई पढ़ कर.बाकी काम से ही वक़्त और इंसान की अहमियात घटती और बढती है.सफर में आने के लिए शुभकामनायें....

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