मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

कहते कहते....................

कहते कहते बात अपनी कह गए |

हम अकेले थे अकेले रह गये ||


चुपके चुपके आइनों की बात सुन |

सिसकियाँ लेते वो आंसू बह गए ||


यादों की बारात अपने साथ थी |

भीड़ में होकर भी तन्हा रह गये ||


टूटते है कैसे लोग दुनियां में |

ठोकरें खाते किनारे कह गए ||


दिल से दिल मिलना तो गुजरी बात है |

हाथ हाथों से मिलाते रह गए ||

21 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

टूटते है कैसे लोग दुनियां में |
ठोकरें खाते किनारे कह गए ||
बहुत सुन्दर गज़ल. ये शेर तो खासतौर पर मुझे बहुत पसन्द आया.

मनोज कुमार ने कहा…

इस ग़ज़ल को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत खूब सिंह साहब, लगे रहिये !

वीनस केशरी ने कहा…

दिली दाद कबूल करें

सुन्दर भावाभिव्यक्ति

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

aiase kaise akele chhodenge...

aapke saath hain...kamaal ki rachna hai....

आमीन ने कहा…

great

singhsdm ने कहा…

पिंटू तुम्हारी इस बढ़िया ग़ज़ल को पढ़ कर निकाह फिल्म का एक गीत याद आ गया.....दिल के अरमाँ आसुओं में बह गए, हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए !

ये शेर खूब पसंद आये......

यादों की बारात अपने साथ थी |

भीड़ में होकर भी तन्हा रह गये ||

वह मुकम्मल शेर...... दाद.


दिल से दिल मिलना तो गुजरी बात है |

हाथ हाथों से मिलाते रह गए ||

वाह वाह फिर से उतनी ही दाद.......!

Shekhar Suman ने कहा…

maaf kijiyega thodi der ho gayi aane mein...
naukri ki talash mein bzy hoon aaj kal...
bahut hi khubsurat rachna hai aapki....
behtareen...
-------------------------------------
mere blog par is baar
तुम कहाँ हो ? ? ?
jaroor aayein...
tippani ka intzaar rahega...
http://i555.blogspot.com/

रश्मि प्रभा... ने कहा…

टूटते है कैसे लोग दुनियां में |
ठोकरें खाते किनारे कह गए ||
bahut hi badhiyaa

Prem Farrukhabadi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Prem Farrukhabadi ने कहा…

दिल मिलाने की चाह में हम
हाथ हाथों से मिलते रह गए.

बहुत अच्छा .बधाई!

हर्षिता ने कहा…

बहुत ख़ूब .बधाई!

mridula pradhan ने कहा…

bahut sunder kavita.

Amit Khanna ने कहा…

चुपके चुपके आइनों की बात सुन |
सिसकियाँ लेते वो आंसू बह गए ||

Bahut achee,, awesome

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

bhai p.singh ji,
vande!
aapke blog par aaj pehli bar aaya hun.aapki rachnaon ka rasaswadan kar bahut aanand aaya.badhai achhe blog ke liye!aapki gazlon par bahut kuchh kehne-likhne ki tamnna hai lekin fir kabhi.filhal khoob likhne or aage badhne ke liye shubhkamnayen.
MERA NIVEDAN-
aap ye pustak jaroor padhen-
"URDU KAVITA OR CHHAND SHASTRA"
lekhak-NARESH NADEEM
saransh prakashan
142-E,poket-4,mayoor vihar faj-1 DILLI-110091 keemat-150/-

kshama ने कहा…

टूटते है कैसे लोग दुनियां में |

ठोकरें खाते किनारे कह गए ||
Yah panktiyan behtareen hain!

संजय भास्कर ने कहा…

सुंदर शब्दों के साथ.... बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....

कविता रावत ने कहा…

टूटते है कैसे लोग दुनियां में |

ठोकरें खाते किनारे कह गए ||
........sundar chitran..
Bhavpurn abhivyakti ke liye dhanyavaad...

आशीष/ ASHISH ने कहा…

बेहद उम्दा! एक कोशिश मेरी भी....
कल मुझे तन्हाई में भी भीड़ का अहसास था,
तुझसे मिला तो ऐ सनम भीड़ में भी तनहा हूँ मैं!

Shekhar Suman ने कहा…

-----------------------------------
mere blog mein is baar...
जाने क्यूँ उदास है मन....
jaroora aayein
regards
http://i555.blogspot.com/

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

खोजें