मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

जिंदगी यूँ ही........................................

जिंदगी यूँ ही जिए जा रहा हूँ |
आंसू वफ़ा के पिए जरा हूँ ||

हिस्से में अपने राहें पड़ी है |
मंजिल ए जुस्तजू लिए जा रहा हूँ ||

पहचान अपनी खो ही गयी है |
चहरे बदलकर जिए जा रहा हूँ ||

वो टुटा हुआ जाम उठा दे ए साकी |
होश की बातें किए जा रहा हूँ ||

करती शरारत कमबख्त ऑंखें |
इल्जाम दिल को दिए जा रहा हूँ ||

14 टिप्‍पणियां:

amritwani.com ने कहा…

bahut sundar gazal



shekhar kumawat


http://kavyawani.blogspot.com/

Dev ने कहा…

बहुत खूबसूरत लब्जों से नवाज़ा है
प्रशंसनीय

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

पहचान अपनी खो ही गयी है |
चहरे बदलकर जिए जा रहा हूँ ||
बहुत सुन्दर गज़ल. बधाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

करती शरारत कमबख्त ऑंखें
इल्जाम दिल को दिए जा रहा हूँ ..

ऐसा ही होता है अक्सर ... कोई ख़ाता करता है सज़ा कोई और पाता है ... लाजवाब ग़ज़ल है ...

pankaj ने कहा…

dear pushpendra ,

you are writing what you are feeling . your writing shows that you are really a nice human being . you are going close to ''BODHATVA''.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

raam raam bhaiya ji...

bahute he bhadiyaa gazal likhe ho bhaiya....

kaa baat....sab theek to hai na....aise rumaani hoge to kaise chalega ;-)

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत खूबसूरत लब्जों से नवाज़ा है

संजय भास्कर ने कहा…

आपने बड़े ख़ूबसूरत ख़यालों से सजा कर एक निहायत उम्दा ग़ज़ल लिखी है।

kshama ने कहा…

करती शरारत कमबख्त ऑंखें |
इल्जाम दिल को दिए जा रहा हूँ ||
Harek pankti gazab ki hai!

psingh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
माधव ने कहा…

मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन और टिप्पड़ी के लिए धन्यावाद .आपके ब्लॉग पर भी मै पहली बार आया हूँ और ब्लॉग पढ़कर मजा आ गया .




http://madhavrai.blogspot.com/

hem pandey ने कहा…

'करती शरारत कमबख्त ऑंखें |
इल्जाम दिल को दिए जा रहा हूँ ||'

-सुन्दर.

singhsdm ने कहा…

18दिनों बाद आमद हुयी.......मगर जोरदार और असरदार आमद की है
जिंदगी यूँ ही जिए जा रहा हूँ |
आंसू वफ़ा के पिए जरा हूँ ||
जरा की जगह जा रहा हूँ कर लें टाइपिंग त्रुटि है शायद......मतला अच्छा पिरोया है.


हिस्से में अपने राहें पड़ी है |
मंजिल ए जुस्तजू लिए जा रहा हूँ ||
बहुत प्यारा ख्याल है.......जिंदाबाद....!


पहचान अपनी खो ही गयी है |
चहरे बदलकर जिए जा रहा हूँ ||
यह हुयी बात.......देर से ही सही दुरुस्त शे'र बुन लिया तुमने.....जीयो....!


वो टुटा हुआ जाम उठा दे ए साकी |
होश की बातें किए जा रहा हूँ ||
ए की जगह ऐ और टुटा की जगह टूटा कर लें.....!बाकी शे'र उम्दा



करती शरारत कमबख्त ऑंखें |
इल्जाम दिल को दिए जा रहा हूँ ||
ओहो.....आहा.....बहुत खूब.....पुरकशिश शे'र !

कविता रावत ने कहा…

जिंदगी यूँ ही जिए जा रहा हूँ |
आंसू वफ़ा के पिए जरा हूँ ||
....bahut khoob!...

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