बुधवार, 13 अप्रैल 2011

कहीं चन्दा कहीं.....

कहीं चन्दा कहीं तारे कही जुगनू चमकते है |
हजारों खुशबुएँ नाकाम है जब वो महकते है ||

कौन कहता इश्क में मंजिल नहीं मिलती |
मुहब्बत की कशिश से दोस्तों पत्थर पिघलते है ||

खुदाया बख्श दे ऐसी नियामत आज उनको |
हजारों फूल हों पैदा जहाँ पत्थर निकलते है ||

गैरों की छोड़ो बात हम अपनों की करते है
गर्दिश में जो हों तारे यहाँ चहरे बदलते है ||

ये कौन सी दुनिया में आ गये है हम |
अमन के फूल खिलते थे वहां शोले दहकते है ||

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

दिल का बोझ हटाना होगा ..........

दिल का बोझ हटाना होगा |

सब को गले लगाना होगा ||


तोड़ के रिश्ते देख लिया जो |

कीमत वही चुकाना होगा ||


किसने दी है दिल को दस्तक |

कोई जख्म पुराना होगा ||


आओ तोड़ें चाँद सितारे |

बच्चों को बहलाना होगा ||


हर कंधे पर उम्मीदें है |

करके कुछ दिखलाना होगा ||


बातें करना प्यार वफ़ा की |

गुजरा हुआ जमाना होगा ||

सोमवार, 27 सितंबर 2010

हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए.......

अपने ही जख्म छुपाने के लिए |
हमने छोड़ा शहर ज़माने के लिए ||

ये किस राह का में रह गुजर हूँ |
कोई पत्थर नहीं उठाने के लिए ||

भले ही लाखों जख्म खाए लेकिन |
दिल है तैयार लगाने के लिए ||

सभी है अपने में मशरूफ साकी |
तुम भी रूठे हो मानाने के लिए ||

यहाँ तो है सभी कातिल निगाहें |
नजर के तीर चलाने के लिए ||

रविवार, 1 अगस्त 2010

सिलसिला

सिलसिला इश्क यूँ ही चलने दो |
लोग जलते है जलें जलने दो ||

लूट कर ले गए वो ख्वाब सभी |
बातों बातों में रात ढलने दो ||

फिर संभल जाएगी हर बहर अपनी |
उनके होठों की गजल बनने दो ||

दिल का मिलना तो दूजी बात है |
पहले हाथों से हाथ मिलने दो ||

(और यह शेर मैने अपने बड़े भइया परम आदर्णीय "पवन जी" के लिए लिखा है )

बस यही इल्तजा रही उनसे |
अपने पैरों की धूल बनने दो ||

गुरुवार, 24 जून 2010

फासले दरमियाँ................

वो हमें हम उन्हें पास लाते रहे
फासले दरमियाँ फिर भी आते रहे


वो गए छोड़ कर हम को ऐसे कहीं
रास्तों पर शमाँ हम जलाते रहे



कुछ हकीकत से अपना न था वास्ता
गीत ख्वाबों के हम गुन गुनाते रहे


अब तलक अपने दिल में अँधेरा रहा
ज्ञान की लौ सभी को दिखाते रहे

हर लहर के मुकद्दर में साहिल नहीं
हौसले टूट कर मुस्कराते रहे

लाख मंजिल तलाशी मगर हमसफ़र

लोग आते रहे लोग जाते रहे

शुक्रवार, 21 मई 2010

वक़्त की चाल कुछ बदली हुई है..................

वक़्त की चाल कुछ बदली हुई है |

हर तरफ वर्फ सी पिघली हुई है ||


वो क्या हसीं मंजर है सोचो |

अँधेरी रात में चाँदनी पिघली हुई है ||


जरा तू बंद करके देख आँखें |

वही तस्वीर, पर धुंधली हुई है ||


भले ही इश्क से तौबा करली |

तमन्ना आज भी मचली हुई है ||


तुम को पा कर ये जाना |
मेरी किस्मत तो संभली हुई है ||

गुरुवार, 13 मई 2010

रात कटती नहीं...........................

रात कटती नहीं सितारों से

हमें उल्फत रही बहारों से


कभी सीने पे जख्म खाते थे

अब डरता हूँ इन शरारों से


तेरा वजूद तो कुछ भी नहीं

तेरी पहचान है बिचारों से


यही पढता रहा किताबों में

सच भारी है झूठ हजारों से


कभी खुल के जुबां से बोल जरा

बात बनती नहीं इशारों से




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