गुरुवार, 13 मई 2010

रात कटती नहीं...........................

रात कटती नहीं सितारों से

हमें उल्फत रही बहारों से


कभी सीने पे जख्म खाते थे

अब डरता हूँ इन शरारों से


तेरा वजूद तो कुछ भी नहीं

तेरी पहचान है बिचारों से


यही पढता रहा किताबों में

सच भारी है झूठ हजारों से


कभी खुल के जुबां से बोल जरा

बात बनती नहीं इशारों से




13 टिप्‍पणियां:

Smart Indian ने कहा…

यही पढता रहा किताबों में |
सच भारी है झूठ हजारों से ||

कभी खुल के जुबां से बोल जरा |
बात बनती नहीं इशारों से ||

बहुत बढ़िया!

बेनामी ने कहा…

bahut hi uttam..
कभी सीने पे जख्म खाते थे |
अब डरता हूँ इन शरारों से ||
waah kya baat hai...

सहज समाधि आश्रम ने कहा…

एक बेहतरीन रचना
काबिले तारीफ़ शव्द संयोजन
बेहतरीन अनूठी कल्पना भावाव्यक्ति
सुन्दर भावाव्यक्ति .साधुवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

सूफ़ी आशीष/ ਸੂਫ਼ੀ ਆਸ਼ੀਸ਼ ने कहा…

क्या सिंह साब!
मार ही डालोगे?!
बहुत अच्छा लिखा है....
कभी खुल के जुबां से बोल जरा
बात बनती नहीं इशारों से......

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सिंह साहब, बहुत ही बढ़िया लिखते है आप, बस एक विनती है ज़रा लिखते समय शब्द के उच्चारण का ख्याल रखा करें जैसे कि बजूद = वजूद !!
मेरी बात का बुरा ना माने सिर्फ़ एक मित्र के नाते आपको बताने का दुसाहस किया है !!



बाकी नज़्म बेहद उम्दा बन पड़ी है - बधाइयाँ !!

Urmi ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है! लाजवाब !

kshama ने कहा…

Behad sundar alfaaz!

अरुणेश मिश्र ने कहा…

गजल पूर्ण व पुष्ट ।

Prem Farukhabadi ने कहा…

bahut sundar bhav .Badhai!!

हर्षिता ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत गजल है सिंह जी।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कभी खुल के जुबां से बोल जरा
बात बनती नहीं इशारों से

Sach kaha hai aaj ka amaana khul kar baat karne ka hai .. lajawaab gazal ke behatreen sher ...

Pawan Kumar ने कहा…

वाह वाह......अब ग़ज़ल का छप्पर आप अपने कन्धों पर उठाने की स्थिति में आ गए है.......

रात कटती नहीं सितारों से

हमें उल्फत रही बहारों से
(यहाँ 'हमें' की जगह 'हमको' करके देखिये, मतले का पूरा मज़ा आएगा )
अब डरता हूँ इन शरारों से

तेरा वजूद तो कुछ भी नहीं

तेरी पहचान है बिचारों से
( अच्छा ख्याल है........वाह...........)


यही पढता रहा किताबों में

सच भारी है झूठ हजारों से
(सच कहा......नूर साहब का शेर याद आ गया "जड़ दो चाँदी में चाहे सोने में, आईना झूठ बोलता ही नहीं" )


कभी खुल के जुबां से बोल जरा

बात बनती नहीं इशारों से
( आहा.....क्या नाज़ुक शेर लिखने की कामयाब कोशिश है.....जीयो)

संजय भास्‍कर ने कहा…

हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

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