रविवार, 1 अगस्त 2010

सिलसिला

सिलसिला इश्क यूँ ही चलने दो |
लोग जलते है जलें जलने दो ||

लूट कर ले गए वो ख्वाब सभी |
बातों बातों में रात ढलने दो ||

फिर संभल जाएगी हर बहर अपनी |
उनके होठों की गजल बनने दो ||

दिल का मिलना तो दूजी बात है |
पहले हाथों से हाथ मिलने दो ||

(और यह शेर मैने अपने बड़े भइया परम आदर्णीय "पवन जी" के लिए लिखा है )

बस यही इल्तजा रही उनसे |
अपने पैरों की धूल बनने दो ||

गुरुवार, 24 जून 2010

फासले दरमियाँ................

वो हमें हम उन्हें पास लाते रहे
फासले दरमियाँ फिर भी आते रहे


वो गए छोड़ कर हम को ऐसे कहीं
रास्तों पर शमाँ हम जलाते रहे



कुछ हकीकत से अपना न था वास्ता
गीत ख्वाबों के हम गुन गुनाते रहे


अब तलक अपने दिल में अँधेरा रहा
ज्ञान की लौ सभी को दिखाते रहे

हर लहर के मुकद्दर में साहिल नहीं
हौसले टूट कर मुस्कराते रहे

लाख मंजिल तलाशी मगर हमसफ़र

लोग आते रहे लोग जाते रहे

शुक्रवार, 21 मई 2010

वक़्त की चाल कुछ बदली हुई है..................

वक़्त की चाल कुछ बदली हुई है |

हर तरफ वर्फ सी पिघली हुई है ||


वो क्या हसीं मंजर है सोचो |

अँधेरी रात में चाँदनी पिघली हुई है ||


जरा तू बंद करके देख आँखें |

वही तस्वीर, पर धुंधली हुई है ||


भले ही इश्क से तौबा करली |

तमन्ना आज भी मचली हुई है ||


तुम को पा कर ये जाना |
मेरी किस्मत तो संभली हुई है ||

गुरुवार, 13 मई 2010

रात कटती नहीं...........................

रात कटती नहीं सितारों से

हमें उल्फत रही बहारों से


कभी सीने पे जख्म खाते थे

अब डरता हूँ इन शरारों से


तेरा वजूद तो कुछ भी नहीं

तेरी पहचान है बिचारों से


यही पढता रहा किताबों में

सच भारी है झूठ हजारों से


कभी खुल के जुबां से बोल जरा

बात बनती नहीं इशारों से




मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

कहते कहते....................

कहते कहते बात अपनी कह गए |

हम अकेले थे अकेले रह गये ||


चुपके चुपके आइनों की बात सुन |

सिसकियाँ लेते वो आंसू बह गए ||


यादों की बारात अपने साथ थी |

भीड़ में होकर भी तन्हा रह गये ||


टूटते है कैसे लोग दुनियां में |

ठोकरें खाते किनारे कह गए ||


दिल से दिल मिलना तो गुजरी बात है |

हाथ हाथों से मिलाते रह गए ||

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

जिंदगी यूँ ही........................................

जिंदगी यूँ ही जिए जा रहा हूँ |
आंसू वफ़ा के पिए जरा हूँ ||

हिस्से में अपने राहें पड़ी है |
मंजिल ए जुस्तजू लिए जा रहा हूँ ||

पहचान अपनी खो ही गयी है |
चहरे बदलकर जिए जा रहा हूँ ||

वो टुटा हुआ जाम उठा दे ए साकी |
होश की बातें किए जा रहा हूँ ||

करती शरारत कमबख्त ऑंखें |
इल्जाम दिल को दिए जा रहा हूँ ||

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

राहों से कह दो...........................

कहीं जमीं तो कहीं आसमां देखा है |

किसी भी उम्र में दिल जवां देखा है ||


खींचो खून से सरहद की लकीरें |

दोनों तरफ अमन का कारवां देखा है ||


दिल को दुखा के सुकूँ नहीं मिलता |

छलकती आँखों को पशेमां देखा है ||


कैसा रिश्तों के टूटने का दौर आया है

बेचैन हर घर का बागबां देखा है ||


राहों से कह दो दरारें भरा करें |

खुदा को किस्मत पर महरवा देखा है ||

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